Ikkis Movie OTT Review: थिएटर में क्यों पिट गई ये मास्टरपीस?

Ikkis Movie OTT Review: अगस्त्य नंदा की फिल्म 'इक्कीस' हिट है या फ्लॉप? 1971 वॉर की यह कहानी दिल जीतेगी या बोर करेगी? जानें फिल्म की अच्छाइयां, कमियां और बॉक्स ऑफिस का हाल इस डिटेल रिव्यू में।

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February 16, 2026 9:49 AM (IST)
Ikkis Movie OTT Review

1 जनवरी 2026 के दिन सिनेमाघरों में रिलीज हुई फिल्म ‘इक्कीस’, VOD रेंटल पर अब उपलब्ध है। और जल्द ही यह ओटीटी पर भी दस्तक देने वाली है।
फिल्म के मुख्य किरदार में अमिताभ बच्चन के पोते ‘अगस्त्य नंदा‘ नजर आ रहे हैं और यह उनकी पहली फिल्म है।

तो चलिए जानते हैं देश के लिए, दिए गए ‘अरुण क्षेत्रपाल‘ के बलिदान की, यह सच्ची कहानी देखने लायक है या फिर नहीं? और करते हैं फिल्म इक्कीस का डिटेल मूवी रिव्यू।

‘इक्कीस फिल्म की कहानी

इक्कीस की कहानी है उस समय के पाकिस्तान की, जिस समय पाकिस्तानी जनता अपने ही देश में ‘भगत सिंह’ का स्मारक बनाने के लिए उसी जगह पर धरना दे रही है जहां पर भगत सिंह शहीद हुए थे, और इसमें 1971 के भारत-पाक युद्ध का संदर्भ भी है।

इस सीन को देखकर इक्कीस फिल्म के मेकर्स की मंशा साफ पता चलती है, जिसमें उन्होंने दोनों देशों के हर एक एस्पेक्ट को काफी ईमानदारी से दिखाने की कोशिश की है।

इसी बीच ब्रिगेडियर ‘हैदर पाल’ (धर्मेंद्र) इंडिया से पाकिस्तान, रियूनियन ट्रिप पर जाते हैं। हालांकि हैदर पाल की पत्नी और उनके परिवार को उनका पाकिस्तान जाना बिल्कुल भी गवारा नहीं था।

हैदर पाल भले ही पेशे से एक रिटायर ब्रिगेडियर हैं, लेकिन साथ ही साथ काफी मजाकिया किस्म के इंसान भी हैं। क्योंकि वह अपनी बीवी को पाकिस्तान में रहने वाली उनकी दोस्त ‘हुसना’ के बारे में पता बता कर चिढ़ाते भी हैं।

पाकिस्तान आने के बाद हैदर पाल को पाकिस्तान आर्मी के ‘ब्रिगेडियर जान मोहम्मद निसार’ (जयदीप अहलावत) पिकअप करने आते हैं। निसार के परिवार में पत्नी और एक बेटी शामिल है। जहां उनकी पत्नी का नाम ‘मरियम निसार’ (एकावली खन्ना) और बेटी का नाम ‘सबा’ है।

जैसे-जैसे ब्रिगेडियर हैदर पाल पाकिस्तान में घुलने मिलने लगते हैं, साथ ही ब्रिगेडियर निसार की पत्नी को अपने परिवार के बारे में भी बताते हैं। यहीं से इस फिल्म का मुख्य प्लॉट शुरू होता है यानी वह किरदार जिस पर ‘इक्कीस फिल्म’ की कहानी को बुना गया है।

धर्मेंद्र बताते हैं कि उनके परिवार में दो बेटे और पत्नी शामिल हैं, उनके छोटे बेटे का नाम ‘मुकेश’ है जो की 50 साल का है और बड़े बेटे का नाम अरुण है। हालांकि ‘अरुण खेत्रपाल’ (अगस्त्य नंदा) का नाम लेते ही धर्मेंद्र काफी इमोशनल हो जाते हैं, और कहते हैं कि यह हमेशा 21 साल का ही रहेगा। क्योंकि वह इस दुनिया से जा चुका है और 1971 के युद्ध में शहीद हो गया है।

जैसे-जैसे अरुण की कहानी को फिल्म में दिखाया जाता है, बहुत सारी बातें पता चलती हैं। अरुण कि शुरुआती आर्मी ट्रेनिंग खत्म होने से पहले ही युद्ध का ऐलान हो गया था। जिस वजह से उसे अब जल्द ही ‘बतौर सेकंड लेफ्टिनेंट’ सेना में शामिल होना होगा। पर क्योंकि अभी अरुण की ट्रेनिंग पूरी नहीं हुई थी जिस वजह से उसे मैदानी युद्ध में शामिल होने की परमिशन नहीं मिल रही।

हालांकि युद्ध से पहले सभी सैनिकों को NDA में ट्रेनिंग दी जाती है, जहां अरुण की मुलाकात ‘लेफ्टिनेंट कॉलोनल हनौत सिंह’ (राहुल देव) से होती है, हनौत एक काफी गर्मजोशी से भरे हुए इंसान है।

यहीं पर एंट्री होती है अभिनेता अनुपम खेर के बेटे ‘सिकंदर खेर’ की, जिन्होंने इस फिल्म में ‘रिसलदार सगत सिंह’ का किरदार निभाया है। सगत सिंह को उन लोगों से सख्त नफरत है जो ड्यूटी के वक्त स्मोकिंग करते हैं।

इसी आर्मी ट्रेनिंग कैंपस के दौरान, अरुण की मुलाकात ‘किरण कोचर’ (सिमर भाटिया) से एक काफी अटपटे अंदाज में होती है। किरण जो फिलहाल कॉलेज में है और किताबें पढ़ने का शौक रखती है। धीरे-धीरे यह दोनों एक दूसरे के करीब आने लगते हैं, जहां एक तरफ अरुण शिद्दत से अपनी ट्रेनिंग को कंप्लीट करने में लगा हुआ है वहीं दूसरी तरफ किरण की ओर भी खीचा जा रहा है।

साथ ही इस बात के लिए भी काफी इमोशनल रहता है कि उसके साथ वाले सभी लोगों के बीवियों की चिट्ठियां आती हैं, क्योंकि वह सभी शादीशुदा है, और एक अरुण ही है, जो अभी तक सिंगल है। इसी दौरान फिल्म में कई मजाकिया पल भी आते हैं, खासकर वह सिचुएशन जब अरुण को ‘वीनू’ से बॉक्सिंग करनी होती है और वह बीमारी का बहाना करके बचना चाहता है।

इसी दौरान कुछ मुश्किल पल भी आते हैं जब अरुण अपने साथी ‘बेदी’ को कुछ रूल्स फॉलो न करने की वजह से पनिशमेंट देता है और जिस वजह से ‘बेदी’ को सजा के तौर पर 6 महीने के लिए ट्रेनिंग से स्थगित कर दिया जाता है।

फिल्म की यह सिचुएशन इस बात की तरफ इशारा करती है, कि भले ही इंसान कितना भी समझदार हो, लेकिन उससे कहीं ना कहीं चूक तो हो ही जाती है। क्योंकि जब से बेदी के साथ वह हादसा हुआ उसके टीम वाले भी अरुण से बात नहीं कर रहे।

वहीं दूसरी तरफ हैदर पाल जो कि पाकिस्तान में हैं और इसी दौरान वह अपने दोस्त असगर (गोवर्धन असरानी) से भी मुलाकात करते हैं। हालांकि असगर अब हैदर को बिल्कुल भी नहीं पहचान पा रहा। क्योंकि वह अल्जाइमर नाम की भूलने वाली बीमारी से ग्रस्त है।

फिल्म में जहांगीर (दीपक डोबरियाल) नाम का भी एक किरदार मौजूद है, जो हिंदुस्तानी लोगों से सख्त नफरत करता है और पैर से अपाहिज है। क्योंकि दीपक ने इसी जंग के दौरान अपना एक पैर खो दिया था, यही वजह है कि वह हिंदुस्तानियों से नफरत करता है। फिल्म में ‘जाकिर हुसैन’ भी शामिल हैं, जिन्होंने फिल्म में पाकिस्तानी I.S.I एजेंट का किरदार निभाया है।

इसी दौरान आता है इस फिल्म का वह मुख्य हिस्सा, जहां लोंगेवाला नाम के इलाके की वह रात आती है, जब करनाल जिया उर्रहमान और उनकी छोटी सी टुकड़ी जिसमें ‘अरुण क्षेत्रपाल’ भी शामिल थे, देश के लिए इस इलाक़े को बचाने के लिए जुट जाते हैं।

क्या अब फिल्म के अंत तक भारतीय सेना के यह लड़ाके, इस युद्ध को जीत पाते हैं और पाकिस्तान को लोंगेवाला इलाक़े से खदेड़ पाते हैं? यह सब जाने के लिए आपको देखनी होगी फिल्म इक्कीस।

मूवी के कमजोर पक्ष

फिल्म ‘इक्कीस’ ने सिनेमाघरों में रिलीज होने के बाद अपने लाइफटाइम में भारतीय नेट कलेक्शन के मामले में तक़रीबन 35.35 करोड़ रुपए कमाए। जो काफी निराशाजनक रहा,क्योंकि इसका टोटल बजट ही सिर्फ ४०-६० करोड़ रूपये के बिच था। और मुझे लगता है इसका मुख्य कारण फिल्म की लंबाई और कहानी का एग्जीक्यूशन था।

इक्कीस मूवी की टोटल लंबाई 2 घंटा 27 मिनट के भीतर है, जो काफी लम्बी है, और कहानी का एग्जीक्यूशन काफी स्लो फील होता है। मेरे हिसाब से यही वजह रही जिसके कारण दर्शक सिनेमाघरों में इस फिल्म से कनेक्ट नहीं कर पाए।

कुछ फिल्में ऐसी होती हैं, जिन्हें सीधे ओटीटी पर रिलीज करना ही सबसे बेहतर ऑप्शन माना जाता है। और मुझे लगता है ठीक ऐसा ही इक्कीस फिल्म के साथ भी किया जाना चाहिए था, क्योंकि इस फिल्म के मुख्य चेहरे के रूप में कोई बड़ी स्टार कास्ट शामिल नहीं थी।

फिल्म की अच्छी चीजें

फिल्म की कहानी फ्लैशबैक और प्रेजेंट टाइम में चलती है, लेकिन फिर भी यह कहानी कहीं पर भी कंफ्यूज नहीं करती। जिसे डायरेक्टर ‘श्रीराम राघवन’ का जादू कहा जा सकता है। श्रीराम राघवन इससे पहले ‘बदलापु’र, ‘मर्डर 2’ और ‘एजेंट विनोद’ जैसी फिल्में निर्देशित कर चुके हैं, और उन्होंने इक्कीस फिल्म में भी लाजवाब डायरेक्शन किया है।

यह फिल्म अमिताभ बच्चन के पोते ‘अगस्त्य नंदा’ की पहली डेब्यू फिल्म है, और इस तरह का आर्मी वाला किरदार किसी नए एक्टर के लिए करना मेरे हिसाब से काफी मुश्किल होता है। हालांकि अगस्त्य ने अपने किरदार को बखूबी जिया है क्योंकि अपने इस किरदार के लिए उनका पैशन फिल्म के हर एक सीन में दिखाई देता है।

वही सपोर्टिंग किरदारों की बात करें तो राहुल देव, स्वर्गीय असरानी और वेब सीरीज ‘पाताल लोक’ से चर्चित हुए एक्टर जयदीप अहलावत ने भी अपने-अपने किरदारों को अच्छे से निभाया है। और मुझे लगता है अगर इस फिल्म को सीधे ओटीटी पर ड्रॉप किया जाता तो यह सक्सेस हो सकती थी।

टेक्निकल एस्पेक्ट

इक्कीस फिल्म का कैमरा वर्क शानदार है, जहां पर हाल ही में रिलीज हुई सनी देओल की फिल्म ‘बॉर्डर 2’ जैसा कमजोर वीएफएक्स बिल्कुल भी देखने को नहीं मिलता है। क्योंकि फिल्म ‘इक्कीस’ में हर एक सीन रियल फील देता है। फिर चाहे वह सेना के टैंकर हों या जमीनी लड़ाई, यहां हर एक एस्पेक्ट पर फिल्म खरी उतरती है।

निष्कर्ष

अगर आप रियल इंसीडेंट पर बनी बायोपिक फिल्में देखना पसंद करते हैं, तब फिल्म इक्कीस को एक बार जरूर देखें। क्योंकि यह हमें बताती है,के किस तरह से हमारी भारतीय सेना ने देश को बचाने के लिए कदम कदम पर अपनी जान निछावर की है और निरंतर करती रहेगी।

वर्तमान समय में इक्कीस फिल्म VOD यानी रेंटल बेस पर उपलब्ध है, हालांकि 26 फरवरी 2026 के दिन से इस मूवी को भारत में अमेजॉन प्राइम वीडियो पर भी उपलब्ध करा दिया जाएगा।

रेटिंग: 3.5/5

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  • arslan khan is a author of oyeisfriday.com

    मैं अर्सलान खान हूँ। बॉलीवुड और OTT कंटेंट के गहन रिव्यू और विश्लेषण का शौक और विशेषज्ञता रखता हूँ। मैंने जामिया मिलिया इस्लामिया से मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स किया है, जिसमें फिल्म स्टडीज और क्रिटिसिज्म भी शामिल था। बीते समय में मुझे अमर उजाला के एंटरटेनमेंट डेस्क में काम करने का अनुभव रहा है। और अब मै Oyeisfriday पर बेबाक और गहराई वाले रिव्यूज़ लिखता हूँ,फिर चाहे फिल्म हो या वेब सीरीज।

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