Jab Khuli Kitaab Review: पंकज कपूर के तलाक लेने की जिद और आखिर क्या है 50 साल पुराना राज जाने जब खुली किताब में

Jab Khuli Kitaab Movie Review: सौरभ शुक्ला के निर्देशन में बनी 'जब खुली किताब' एक इमोशनल फैमिली ड्रामा है। क्या उत्तराखंड की वादियों में बुनी यह धीमी रफ्तार वाली आर्ट मूवी आपको देखनी चाहिए? पढ़ें रिव्यू।

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March 11, 2026 12:16 PM (IST)
Zee5 Jab Khuli Kitaab Review in Hindi

फिल्म ‘जब खुली किताब’ Zee5 पर 6 मार्च 2026 से रिलीज कर दी गई है। यह एक रोमांटिक ड्रामा कॉमेडी फिल्म है हालांकि कॉमेडी यहां पर कम और ड्रामा ज्यादा देखने को मिलता है। सौरभ शुक्ला ने एक किताब लिखी थी ‘जब खुली किताब’ नाम की और इन्होंने ही इस फिल्म का निर्देशन भी किया है।

यहां पंकज कपूर गोपाल चंद्र नौटियाल और डिंपल कपाड़िया अनुसूया के कैरेक्टर में दिखाई देंगे। सपोर्टिंग कलाकारों में समीर सोनी, मानसी, अपारशक्ति खुराना, नौहीद दिखाई दे रहे हैं। आमतौर पर देखें तो यह सौरभ शुक्ला का एक प्ले है।

इस प्ले को फिल्म में तब्दील करने में काफी समय लग गया, हालांकि फिल्म की शूटिंग की घोषणा 2021 के अंत में ही कर दी गई थी, पर कोविड-19 के आने की वजह से इसमें देरी हुई। सौरभ शुक्ला को अगर आप नहीं जानते हैं तो यह वही हैं जो ‘जौली एलएलबी’ में जज के कैरेक्टर में थे।

क्या है फिल्म का बेसिक प्लॉट

6 मार्च 2026 से zee5 पर स्ट्रीम हो रही ‘जब खुली किताब’ में गोपाल और उसकी पत्नी अनुसूया की कहानी को दिखाया गया है। अनुसूया पिछले दो साल से कोमा में थी। गोपाल यानी पंकज कपूर अपनी पत्नी अनुसूया की दिलो जान लगाकर खिदमत कर रहे होते हैं।

गोपाल और अनुसूया के दो बेटे और एक बेटी है बेटा परमेश्वर और ढोलू, वहीं बेटी का नाम सुजाता है। कहानी में ट्विस्ट उस समय आता है जब एक दिन अनुसूया का छोटा बेटा,पोते-पोती अनुसूया की बॉडी के साथ छेड़छाड़ करते हैं और वह अचानक से कोमा से बाहर आ जाती है।

कोमा से बाहर आने की जानकारी पोते अपने दादा गोपाल को जाकर देते हैं। पर कोमा से बाहर आने के बाद अनुसूया गोपाल को 50 साल पहले का एक ऐसा राज बता देती है जिसे सुनकर गोपाल अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है और गुस्से से तिलमिला जाता है।

50 साल पहले के राज की वजह से वह अब अनुसूया से तलाक लेने की बात करता है। तलाक के लिए वह एक एडवोकेट का सहारा लेता है जिसका कैरेक्टर अपारशक्ति खुराना ने प्ले किया है। अब आखिर वह कौन सा राज था जिसकी वजह से गोपाल अपनी पत्नी से तलाक लेना चाहता है, यह तो आपको फिल्म देखकर ही पता लगाना होगा।

क्या खास है जब खुली किताब में

मुझे अक्सर इस तरह की फिल्में बहुत पसंद आती हैं जो लीक से हटकर बनाई जाती हैं, पर इस फिल्म से मुझे आशा के साथ थोड़ी निराशा भी हुई। यह एक इमोशनल फैमिली ड्रामा फिल्म है, जहां बहुत कम कॉमेडी देखने को मिलती है।

जो दर्शक फास्ट पेस्ड एक्शन थ्रिलर हाई ड्रामा देखना पसंद करते हैं खासकर आज के युवा जिनको इमोशनल ड्रामा देखना इतना पसंद नहीं, साथ ही मास फिल्म को देखने वाले लोगों को भी यह फिल्म पसंद नहीं आएगी।

जिन दर्शकों को आर्ट मूवी देखने का शौक है उन्हें यह 100% सेटिस्फाइड करेगी। यह कोई तेजी के सहारे चलने वाली फिल्म नहीं है बल्कि कहानी धीरे-धीरे अपनी ओर दर्शकों को बांधती है।

हां कहानी में थोड़ा सा इलॉजिकल पार्ट तो है जहां पर कोई जरूरत नहीं थी कि 50 साल बाद के राज को दोबारा से खोला जाए और गोपाल को जिस तरह से इस राज के खुलने के बाद उस पर रिएक्ट करते दिखाया गया है वह भी थोड़ा बचकाना सा लगता है।

पर हां यहां एक परिवार को दिखाया गया है और यह परिवार बागबान फिल्म के जैसा नहीं है, यहां सब खुले मिजाज के लोग हैं। मुझे लगता है अपारशक्ति खुराना का कैरेक्टर थोड़ा और लंबा करना चाहिए था क्योंकि वह जब-जब स्क्रीन पर आए तब फिल्म एक नए रूप में दिखाई दी। फिल्म देखते समय साफ जाहिर होता है कि बहुत सी जगह पर गोपाल गलत है और अनुसूया सही है।

जब खुली किताब के कुछ नेगेटिव पॉइंट

एक औरत कोमा से उठती है और तुरंत अपने 50 साल पुराने राज खोलने लगती है ऐसा दिखाना और इसे समझना दिमाग से परे था। 50 साल बाद गोपाल को यह राज बताने की जरूरत क्या थी जब आपका परिवार अब स्टेबल हो चुका है।

सब कुछ ठीक चल रहा है, फिर कौन सी जरूरत आ पड़ी कि आपने इस राज को उजागर किया और जब तलाक लेने की बारी आती है तो घर वाले अपने बाप को समझाते क्यों नहीं कहानी बीच-बीच में बोरिंग हो जाती है, कैरेक्टर से इमोशनल रूप से जुड़ाव कम होता है।

‘जब खुली किताब’ का अंत सेटिस्फेक्शन नहीं देता। अगर गोपाल के केस को सुनने वाली जज महिला के कैरेक्टर को थोड़ा और बढ़ाकर दिखाते और परिवार के सदस्यों को और भी गहराई से बताते तब शायद और मजा आता इसे देखने में।

क्या आपको देखना चाहिए जब खुली किताब फिल्म को

पंकज कपूर और उनकी पत्नी डिंपल कपाड़िया दोनों ही बेहद खूबसूरत कपल लग रहे हैं जिन्हें देखकर ही रोमांटिक फीलिंग आती है। कुछ डायलॉग को छोड़कर बाकी बहुत बड़े डायलॉग यहां सुनने को नहीं मिलते। गंभीर फिल्म देखने वाले दर्शकों को यह बहुत पसंद आने वाली है।

सिनेमैटोग्राफी काफी शानदार है जो कि उत्तराखंड के परिवेश को दिखाती है। सौरभ शुक्ला ने फिल्म के माध्यम से संदेश दिया है कि माफी से रिश्ता और भी मजबूत हो जाता है, प्यार की कोई उम्र नहीं होती, जिंदगी के आखिरी पड़ाव में भी प्यार फिर से खिल सकता है।

रेटिंग: 3/5

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    मैं आमिर खान हूँ। हिंदी सिनेमा और OTT प्लेटफॉर्म्स की फिल्मों-वेब सीरीज का गहराई से विश्लेषण और ईमानदार रिव्यू करता हूँ। दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज्म में ग्रेजुएशन किया है। अमर उजाला के एंटरटेनमेंट डेस्क में कुछ साल काम करने का अनुभव भी रहा। बॉलीवुड की हर धड़कन, ट्रेंड्स और क्वालिटी कंटेंट पर पैनी नजर रखता हूँ। यहीं पर बिना किसी लाग-लपेट के अपनी राय रखता हूँ।

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